अजित पवार ने जब अपने चाचा और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के अध्यक्ष शरद पवार को छोड़कर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का हाथ थाम लिया तो ज्यादातर लोगों ने यही कहा कि राजनीति में कभी भी कुछ भी हो सकता है. कहा जा रहा है कि चचेरी बहन तथा सीनियर पवार की बेटी सुप्रिया सुले के उदय और अपनी अतिमहत्वाकांक्षा के कारण महाराष्ट्र के नए उपमुख्यमंत्री ने ऐसा कदम उठाया कि विपक्षी खेमा हैरानी से मुंह ही ताकता रह गया.
हालांकि, चाचा-भतीजे के खेमों के बीच जुबानी जंग यह साबित करती है कि यह विभाजन जितना राजनैतिक है, उससे कहीं ज्यादा व्यक्तिगत है. जब अजित ने 82 वर्षीय पवार को उम्र का तकाजा बता राजनीति से संन्यास लेने की नसीहत दी तो सुले को यह बर्दाश्त नहीं हुआ और उन्होंने अपने चचेरे भाई का नाम लिए बगैर ही हद पार न करने की चेतावनी दे डाली: “हम कुछ भी सुन लेंगे दे लेकिन माता-पिता पर हमला कतई बर्दाश्त नहीं करेंगे...." पवार ने भी चेताया कि अगर कोई उनकी उम्र को लेकर तंज कसेगा, तो उसे इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी. अजित ने यह खुलासा भी किया कि फिलहाल सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष को एकजुट करने के प्रयासों में अहम भूमिका निभा रहे उनके चाचा ने 2014 के बाद से कई मौकों पर इसी पार्टी (भाजपा) के साथ 'बात' की थी (निश्चित तौर पर, पहली बार यह बात सार्वजनिक तौर पर तब सामने आई थी जब उस साल विधानसभा चुनाव के बाद एनसीपी ने सरकार बनाने के लिए भाजपा को 'बाहर से समर्थन देने की पेशकश की थी.)
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