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वोटोक्रेसी नहीं डैमोक्रेसी चाहिए

Sarita|March First 2025
लोकतंत्र वोट देने और लेने तक सीमित रह गया है. जनता, जिसे कभी सत्ता का मुख्य बिंदु माना जाता था, अब सिर्फ एक दिन भूमिका निभाती है. वोटोक्रेसी व डैमोक्रेसी का फर्क धुंधलाता जा रहा है. आइए समझते हैं कि कैसे लोकतंत्र का रूप बदलते वक्त के साथ अपने माने खो रहा है. दि
वोटोक्रेसी नहीं डैमोक्रेसी चाहिए

दिल्ली विधानसभा के चुनाव हाल ही में हुए हैं. प्रधानमंत्री तक उस के चुनावी प्रचार में आखिर तक लगे रहे कि किसी तरह से 10 साल से मुख्यमंत्री की कुरसी पर बैठे अरविंद केजरीवाल को बाहर निकाला जा सके. इन 10 सालों में उन के उपराज्यपाल ने अरविंद केजरीवाल को एक रात निश्चित रहने नहीं दिया. वे वोटों से जीत कर आए थे. पहली बार उन्होंने कांग्रेस के साथ सरकार बनाई. दूसरी और तीसरी बार वे भारी बहुमत से जीते. लेकिन वे आसानी से राज कभी न कर सके क्योंकि केंद्र के उपराज्यपाल का हंटर उन के सिर पर सभी कार्यकालों के दौरान हमेशा रहा.

यह साबित करता है कि देश में वोटतंत्र या वोटोक्रेसी है पर डैमोक्रेसी कितनी और कैसी है, इस का अंदाजा घटनाओं और मुद्दों को देख कर लगाया जा सकता है, गिना नहीं जा सकता. देश में 1952 से वोटोक्रेसी तो है पर जिसे डैमोक्रेसी कहा जाना चाहिए उस के बारे में पूरा संशय है. हर रोज लगता है कि देश में एक अघोषित तानाशाही, डिक्टेटरशिप चल रही है. जबकि, हर बार समय पर चुनाव हो रहे हैं. सो, वोटोक्रेसी तो पक्का है.

वोटोक्रेसी शब्द का इस्तेमाल कहींकहीं कोई करता है पर इस का अर्थ स्पष्ट है, ऐसी शासन पद्धति जिस में लोग वोट देते हैं पर क्या वोटोक्रेसी ही डैमोक्रेसी या लोकतंत्र है? नहीं, बिलकुल नहीं. वोट दे कर डैमोक्रेसी की पहली और सिर्फ पहली सीढ़ी चढ़ी जाती है. डैमोक्रेसी वह शासन पद्धति है जिस में जनता को लगे कि शासन में जो बैठे हैं वे उस के बलबूते पर, उस की सेवा के लिए, उस की आशाओं व आकांक्षाओं को पूरा करने के लिए उस के ही चुने हुए लोग हैं.

अब्राहम लिंकन आज होते तो लोकतंत्र की अपनी परिभाषा में मामूली फेरबदल करते कहते यही कि बाकी सब तो ठीक है लेकिन अब शासन जनता द्वारा नहीं बल्कि उन के चुने हुए उन प्रतिनिधियों द्वारा होता है जो अपनी मनमरजी करते हैं, अपने लिए राज करते हैं. लोकतंत्र का सीधा सा मतलब अधिकांश लोकतांत्रिक देशों में वोट लेना और वोट देना रह गया है.

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