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बदलाव अब नहीं तो कब

India Today Hindi

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April 30, 2025

वह साबरमती का तट ही था, जहां महात्मा गांधी ने कभी भारत के स्वतंत्रता संग्राम को परवान चढ़ाया था. कांग्रेस शायद अपने ही कुछ कर्मों से मुक्ति की तमन्ना में अपने 86वें अखिल भारतीय कांग्रेस समिति (एआइसीसी) के सत्र के लिए यहां लौटी और 64 वर्षों में गुजरात में अपना पहला अधिवेशन आयोजित किया.

- कौशिक डेका

बदलाव अब नहीं तो कब

2024 के लोकसभा चुनाव के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गृह राज्य में यह उसकी पहली बड़ी बैठक थी. गुजरात की सत्ता से पार्टी पिछले तीन दशक से बाहर है और यह अपनी विरासत पर फिर से दावा करने की उसकी प्रतीकात्मक कवायद थी. उस उद्देश्य पर गंभीरता से ध्यान दिया गया और भाजपा ने विरासत रूपी जिन महापुरुषों को उससे छीन लिया है उन्हें फिर से हासिल करने के लिए रणनीतिक समायोजन किए गए. सरदार पटेल की 150वीं जयंती इसके लिए मुफीद साबित हुई और साबरमती आश्रम की तरह पटेल स्मारक को भी कार्यक्रम में प्रमुखता मिली. इसके हर कदम में गुजरात की समग्र विरासत की झलक मिली तथा न्याय, संवैधानिक मूल्यों और इन सबसे बढ़कर राष्ट्रीय प्रासंगिकता के लिए नए सिरे से जंग छेड़ने के साथ पार्टी अपना ऐतिहासिक गौरव फिर हासिल करने के लिए संघर्ष करती नजर आई. पार्टी के हर सियासी प्रस्ताव में इसी की गूंज नजर आई.

सांकेतिक प्रयासों से इतर संगठनात्मक खाके से जुड़े प्रस्ताव को अहमदाबाद अधिवेशन का सबसे अहम पहलू माना जा सकता है. यह मानते हुए कि कई राज्यों में काडर संरचना कमजोर हो गई है, कांग्रेस ने जिला कांग्रेस समितियों (डीसीसी) को सशक्त बनाने के उद्देश्य से बदलाव का ऐलान किया. उम्मीदवार चयन में अब जिला अध्यक्षों के इनपुट को तरजीह दी जाएगी. इस सुधार का उद्देश्य पार्टी को स्थानीय परिस्थितियों के प्रति अधिक उत्तरदायी बनाना है. वंशवादी राजनीति की परंपरा और आलाकमान संस्कृति के लिए अक्सर आलोचनाएं झेलने वाली पार्टी में इस सुधार को संचालन संबंधी डीएनए को बदलने का एक महत्वाकांक्षी प्रयास कहा जा सकता है. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने निष्क्रिय नेताओं को साफ बता दिया, “जो लोग काम नहीं करना चाहते हैं उन्हें सेवानिवृत्त हो जाना चाहिए या आराम से बैठना चाहिए.” यह इस बात का संकेत है कि संगठनात्मक सुस्ती ने चुनावी हार में अहम भूमिका निभाई है.

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