
यह कहना सही होगा कि युक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलिंस्की का ह्वाइट हाउस दौरा विनाशक साबित हुआ। वे वहां अमेरिका से खनिजों पर सौदा करने गए थे, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प 350 अरब डॉलर के अनुमानित युद्ध सहयोग के बदले मुआवजे के तौर पर मांग रहे थे। उसके बदले ह्वाइट हाउस में जमा हुए पत्रकारों के सामने जेलिंस्की, ट्रम्प और वान्स के बीच जबानी जंग चालू हो गई, जो अप्रत्याशित और राजनयिक रूप से चौंकाने वाली थी।
जेलिंस्की से ट्रम्प को कोई सहानुभूति नहीं है, यह बात युक्रेन अच्छे से जानता था। चुनाव से पहले ट्रम्प ने जेलिंस्की को सुपर सेल्समैन कहा था, जो हर बार अमेरिका आकर अपने साथ अरबों डॉलर मदद के नाम पर ले जाता है। राष्ट्रपति बनने के बाद ट्रम्प ने उन्हें तानाशाह कह दिया, उनकी कम पब्लिक रेटिंग का मखौल उड़ाया और युक्रेन में चुनाव करवाने की बात कही। चुनाव के दौरान और उसके बाद भी ट्रम्प ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमिर पुतिन से वार्ता करने की अपनी मंशा जाहिर की थी और युक्रेन की जंग को खत्म करने की दिशा पर काम करने की बात कही थी क्योंकि युद्ध को वे पैसे और जीवन की बरबादी मान रहे थे और उन्हें आशंका थी कि यह कहीं तीसरे विश्व युद्ध में न तब्दील हो जाए।
विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने भी सीनेट की बैठकों में इस युद्ध को खत्म करने की बात पर जोर दिया था क्योंकि युक्रेन के पास अब युद्ध जारी रखने के संसाधन नहीं बच रहे। रक्षा मंत्री पीट हागसेथ ने पिछले महीने म्यूनिख सिक्योरिटी कॉन्फ्रेंस में कहा था कि यूरोप को शामिल किए बगैर अमेरिका इस युद्ध को खत्म करने के लिए सीधे रूस से बात करने की मंशा रखता है क्योंकि यूरोप बीते तीन साल में इसका कोई हल नहीं निकाल सका है।
अमेरिका फिलहाल इस मामले में युक्रेन को भी शामिल करने की जरूरत महसूस नहीं कर रहा। एक बार अमेरिका और रूस बुनियादी बातों पर राजी हो जाएं, तो फिर युक्रेन को साथ बैठाया जा सकता है। रूस के लिए अमेरिका के साथ तरोताजा हुए अपने अनुबंध के उद्देश्य व्यापक हैं और यह केवल युक्रेन युद्ध को खत्म करने तक सीमित नहीं है।
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