
भारत की बहुसंख्यक शाकाहारी आबादी की प्रोटीन, खनिज एवं विटामिन्स की प्रतिपूर्ति हेतु दैनिक भोजन में दालों का समावेश आवश्यक रहता है। विश्व में सबसे ज्यादा क्षेत्र में दलहनी फसलों की खेती करते हुए सबसे बड़े उत्पादक देश (वैश्विक उत्पादन का 25 प्रतिशत) होने पर हम हर्षित भले ही हो सकते हैं परन्तु गर्वित बिल्कुल नहीं हो सकते क्योंकि कृषि प्रधान देश होने के बावजूद हमें अपनी घरेलु आवश्यकता की पूर्ति हेतु औसतन 40 लाख टन दालों का आयात विदेशों से करना पड़ता है। भारत में प्रति व्यक्ति दालों की उपलब्धता वर्ष 1951 में 60 ग्राम थी जो वर्तमान में घटकर 41-42 ग्राम के आसपास आ गई है, जबकि विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार यह मात्रा 80 ग्राम प्रतिदिन प्रति व्यक्ति होनी चाहिए। दूसरी तरफ विश्व स्वास्थ्य संगठन तथा विश्व खाद्य और कृषि संगठन ने प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 104 ग्राम दालों की संस्तुति की है।
भारत सरकार, कृषि विभाग और कृषि वैज्ञानिकों के तमाम प्रयासों के बावजूद भी दालों की खपत (22-26 मिलियन टन) के विरुद्ध दलहनी फसलों का उत्पादन पिछले 10-12 वर्षों से 18-20 मिलियन टन पर टिका हुआ है जिसके परिणामस्वरूप घरेलू खपत की पूर्ति हेतु प्रति वर्ष 4-6 मिलियन टन दालें विदेशों से आयात करनी पड़ती है। यद्यपि इंद्र देव की मेहरबानी से पिछले 2-3 वर्षों से मानसून अच्छा रहने एवं सरकार द्वारा की गई विभिन्न नीतिगत पहलों के परिणामस्वरूप मौजूदा वर्ष 2017-18 के दौरान दलहनों का कुल उत्पादन रिकॉर्ड 23.95 मिलियन टन अनुमानित है, जो विगत वर्ष के दौरान प्राप्त 23.13 मिलियन टन उत्पादन की तुलना में 0.82 मिलियन टन अधिक है। परन्तु अभी भी हम यह नहीं कह सकते हैं कि दलहन उत्पादन के मामले में हमारा देश आत्मनिर्भर हो गया है। भारतीय दलहन शोध संस्थान के अनुसार वर्ष 2030 तक देश की जनसंख्या 1.6 बिलियन पहुंच जायेगी और उसे 32 मिलियन टन दालों की आवश्यकता पड़ेगी। इस लक्ष्य के अनुसार देश को प्रतिवर्ष दलहन के उत्पादन में 4.2 प्रतिशत बढ़ोतरी करने की जरूरत है। भारत में खरीफ एवं रबी में क्रमशः 143.41 एवं 149.36 लाख हैक्टेयर क्षेत्र में दलहनों की खेती प्रचलित है जिनसे 636 एवं 889 किग्रा. प्रति हैक्टेयर की दर से उत्पादन प्राप्त किया जाता है।
この記事は Modern Kheti - Hindi の 15th March 2025 版に掲載されています。
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वर्ल्ड फूड प्राईज़ विजेता
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